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ॐ भूर्भुवः॒ स्वः॒ तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यम् भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥
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काम धेनु समूद भूतं सर्वेषां जीवन परम् |
पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थ समर्पितम् ||
साज्यं च वर्ति सं बह्निणां योजितं मया |
दीप गृहाण देवेश त्रैलोक्य तिमिरा पहम् ||
दिव्यं गन्धाढ़्य सुमनोहरम् |
वबिलेपनं रश्मि दाता चन्दनं प्रति गृह यन्ताम् ||
शीत वातोष्ण संत्राणं लज्जाया रक्षणं परम् |
देहा लंकारणं वस्त्र मतः शांति प्रयच्छ में ||
नवभि स्तन्तु मिर्यक्तं त्रिगुनं देवता मयम् |
उपवीतं मया दत्तं गृहाणां परमेश्वरः ||
नवनीत समुत पन्नं सर्व संतोष कारकम् |
घृत तुभ्यं प्रदा स्यामि स्नानार्थ प्रति गृह यन्ताम् ||
ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणा करं |
अर्घ्यं च फ़लं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम् ||
ॐ सर्व तीर्थं समूद भूतं पाद्य गन्धदि भिर्युतम् |
प्रचंण्ड ज्योति गृहाणेदं दिवाकर भक्त वत्सलां ||
विचित्र रत्न खन्चित दिव्या स्तरण सन्युक्तम् |
स्वर्ण सिंहासन चारू गृहीश्व रवि पूजिता ||
ॐ सहस्त्र शीर्षाः पुरूषः सहस्त्राक्षः सहस्त्र पाक्ष |
स भूमि ग्वं सब्येत स्तपुत्वा अयतिष्ठ दर्शां गुलम् ||
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